मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

नही ... नही.... नही

एक बार एक राजा शिकार के लिए जंगल में गया. उसने जंगल में अपने धनुष् से एक शेर का शिकार किया . लेकिन तीर लगने के बाद मरने के पहले उस शेर ने दर्द की वजह से तडप तडपकर बहुत दहाडे मारी. लेकिन उसकी वजह से वहां ध्यानस्थ बैठे एक ऋषी की  तपस्या भंग हुई और उसने गुस्से के मारे राजा को शाप दिया की तुम्हारी उंचाई 25 फिट हो ताकी किसी भी जानवर का शिकार करने से पहले उसे तुम्हारी आहट हो. गुस्से के मारे ऋषी ने शाप तो दिया लेकिन उसकी वजह से राजा की उंचाई इतनी बढ गई कि उसे कही भी जाना एकदम दुश्वार हो गया. इसलिए राजा ने ऋषी से माफी मांगकर क्षमा याचना की और उसकी उंचाई पहले जैसी करनेके लिए विनती की. राजा के बहुत मनाने के बाद ऋषी का गुस्सा कम होकर राजा को उसने उसकी उंचाई पहले जैसी करने की एक तरकीब  बताई. -

'' यहां से आगे 15 किमी जंगल के अंदर एक पागल औरत रहती है ... तूम उसे ढूंढो और उसे ऐसा सवाल पुछो की जिसका जवाब उसने 'नही' ऐसा देना चाहिए...तूम उसे कितने भी सवाल पुछो... उस औरत ने जितनी बार 'नही' कहा उतनी बार तुम्हारी उंचाई 5 फिटसे कम होगी. ''

राजा ने वहांसे आगे 15 किमी जंगल पछाडकर उस पागल औरत को ढूंढा और उस ऋषी के कहे अनुसार उस औरत को अलग अलग सवाल पुछे.

'' तुझे फांसी लगाऊं ?''

'' हां ''

'' तुझे जंगलसे बाहर निकाल दूं ?''

'' हां''

राजा ने उसे न जाने कितने सवाल पुछे लेकिन उसका जवाब 'हां' ही था.

आखिर राजा ने चिढकर उसे सवाल पुछा - '' तूम पागल हो क्या ?''

उसने झटसे जवाब दिया - '' नही''

और क्या आश्चर्य राजाकी उंचाई तुरंत पांच फिटसे घट गई.

राजा की ऊंचाई अब 20 फिट हो गई. 20 फिट उंचाई भी बहुत जादा थी इसलिए राजा ने उसे फिरसे वही सवाल पुछा -

'' तूम पागल हो क्या ?''

उसने फिरसे जवाब दिया '' नही''

राजा की उंचाई फिरसे 5 फिट घट गई और अब राजा 15 फिटका हो गया था. 15 फिट भी अधिक  थे इसलिए राजा ने फिर से उस पागल औरत से पुछा - '' तूम पागल हो क्या?''

वह पागल औरत चिढकर बोली, '' तुम्हे कितनी बार बताना पडेगा, नही, नही, नही''

"हिन्दी" शब्द की व्युत्पत्ति

हिन्दी शब्द का सम्बंध संस्कृत शब्द सिन्धु से माना जाता है। 'सिन्धु' सिन्ध नदी को कहते थे ओर उसी आधार पर उसके आसपास की भूमि को सिन्धु कहने लगे। यह सिन्धु शब्द ईरानी में जाकर ‘हिन्दु’, हिन्दी और फिर ‘हिन्द’ हो गया। बाद में ईरानी धीरे-धीरे भारत के अधिक भागों से परिचित होते गए और इस शब्द के अर्थ में विस्तार होता गया तथा हिन्द शब्द पूरे भारत का वाचक हो गया। इसी में ईरानी का ईक प्रत्यय लगने से (हिन्द ईक) ‘हिन्दीक’ बना जिसका अर्थ है ‘हिन्द का’। यूनानी शब्द ‘इन्दिका’ या अंग्रेजी शब्द ‘इण्डिया’ आदि इस ‘हिन्दीक’ के ही विकसित रूप हैं। हिन्दी भाषा के लिए इस शब्द का प्राचीनतम प्रयोग शरफुद्दीन यज्+दी’ के ‘जफरनामा’(१४२४) में मिलता है। प्रोफ़ेसर महावीर सरन जैन ने अपने " हिन्दी एवं उर्दू का अद्वैत " शीर्षक आलेख में हिन्दी की व्युत्पत्ति पर विचार करते हुए कहा है कि ईरान की प्राचीन भाषा अवेस्ता में 'स्' ध्वनि नहीं बोली जाती थी। 'स्' को 'ह्' रूप में बोला जाता था। जैसे संस्कृत के 'असुर' शब्द को वहाँ 'अहुर' कहा जाता था। अफ़ग़ानिस्तान के बाद सिन्धु नदी के इस पार हिन्दुस्तान के पूरे इलाके को प्राचीन फ़ारसी साहित्य में भी 'हिन्द', 'हिन्दुश' के नामों से पुकारा गया है तथा यहाँ की किसी भी वस्तु, भाषा, विचार को 'एडजेक्टिव' के रूप में 'हिन्दीक' कहा गया है जिसका मतलब है 'हिन्द का'। यही 'हिन्दीक' शब्द अरबी से होता हुआ ग्रीक में 'इंदिके', 'इंदिका', लैटिन में 'इंदिया' तथा अँगरेज़ी में 'इंडिया' बन गया। अरबी एवं फ़ारसी साहित्य में हिन्दी में बोली जाने वाली ज़बानों के लिए 'ज़बान-ए-हिन्दी', लफ़्ज का प्रयोग हुआ है। भारत आने के बाद मुसलमानों ने 'ज़बान-ए-हिन्दी', 'हिन्दी जुबान' अथवा 'हिन्दी' का प्रयोग दिल्ली-आगरा के चारों ओर बोली जाने वाली भाषा के अर्थ में किया। भारत के गैर-मुस्लिम लोग तो इस क्षेत्र में बोले जाने वाले भाषा-रूप को 'भाखा' नाम से पुकराते थे, 'हिन्दी' नाम से नहीं।

हिन्दी


हिन्दी संवैधानिक रूप से भारत की प्रथम राजभाषा है और भारत की सबसे अधिक बोली और समझी जानेवाली भाषा है। चीनी के बाद यह विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा भी है।
हिन्दी और इसकी बोलियाँ उत्तर एवं मध्य भारत के विविध प्रांतों में बोली जाती हैं । भारत और विदेश में ६० करोड़ से अधिक लोग हिन्दी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। फ़िजी,मॉरिशस, गयाना, सूरीनाम की अधिकतर और नेपाल की कुछ जनता हिन्दी बोलती है।
हिन्दी राष्ट्रभाषा, राजभाषा, सम्पर्क भाषा, जनभाषा के सोपानों को पार कर विश्वभाषा बनने की ओर अग्रसर है। भाषा विकास क्षेत्र से जुड़े वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी हिन्दी प्रेमियों के लिए बड़ी सन्तोषजनक है कि आने वाले समय में विश्वस्तर पर अन्तरराष्ट्रीय महत्त्व की जो चन्द भाषाएँ होंगी उनमें हिन्दी भी प्रमुख होगी।