जेम्स बांड एक उड़ान पर एक तेलुगु आदमी के बगल में बैठा था.
तेलुगु: आदमी "नमस्कार, मैं आपका नाम जान सकता हूँ ?"
जेम्स बॉण्ड: "माय नेम इज (अपनी अनोखी शैली में) बॉण्ड" ...................
"...... जेम्स बॉण्ड. "
तो बॉन्ड पूछता है: "और आपका नाम ?"
तेलुगु आदमी : "माय नेम इज राव ...
शिव राव .......
सांबा शिव राव .....
वेंकट सांबा शिव राव ...
यार्गालान्दा वेंकट सांबा शिव राव ...
राजशेखर यार्गालान्दा वेंकट सांबा शिव राव ...
सितारामनुज राजशेखर यार्गालान्दा वेंकट सांबा शिव राव...
विजयवाड़ा सितारामनुज राजशेखर यार्गालान्दा वेंकट सांबा शिव राव ... "
तब से जब कोई बॉण्ड से उसका नाम पूछता है वह बस "जेम्स बॉण्ड कहता हैं"
गुरुवार, 22 अप्रैल 2010
बुधवार, 21 अप्रैल 2010
मंगलवार, 20 अप्रैल 2010
गुरुवार, 15 अप्रैल 2010
ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी क़सम
तू ना रोना, के तू है भगत सिंह की माँ
मर के भी लाल तेरा मरेगा नहीं
मर के भी लाल तेरा मरेगा नहीं
डोली चढ़के तो लाते है दुल्हन सभी
हँसके हर कोई फाँसी चढ़ेगा नहीं
जलते भी गये कहते भी गये
आज़ादी के परवाने
जीना तो उसीका जीना है
जो मरना देश पर जाने
जब शहीदों की डोली उठे धूम से
देशवालों तुम आँसू बहाना नहीं
पर मनाओ जब आज़ाद भारत का दिन
उस घड़ी तुम हमें भूल जाना नहीं
ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी क़सम
तेरी राहों मैं जां तक लुटा जायेंगे
फूल क्या चीज़ है तेरे कदमों पे हम
भेंट अपने सरों की चढ़ा जायेंगे
ऐ वतन ऐ वतन
कोई पंजाब से, कोई महाराष्ट्र से
कोई यू पी से है, कोई बंगाल से
तेरी पूजा की थाली में लाये हैं हम
फूल हर रंग के, आज हर डाल से
नाम कुछ भी सही पर लगन एक है
जोत से जोत दिल की जगा जायेंगे
ऐ वतन ऐ वतन ..
ऐ मेरे वतन के लोगों
ऐ मेरे वतन के लोगों
तुम खूब लगा लो नारा
ये शुभ दिन है हम सब का
तुम खूब लगा लो नारा
ये शुभ दिन है हम सब का
लहरा लो तिरंगा प्यारा
पर मत भूलो सीमा पर
वीरों ने है प्राण गँवाए
कुछ याद उन्हें भी कर लो -२
जो लौट के घर न आये -२
ऐ मेरे वतन के लोगों
ज़रा आँख में भर लो पानी
जो शहीद हुए हैं उनकी
ज़रा याद करो क़ुरबानी
जब घायल हुआ हिमालय
खतरे में पड़ी आज़ादी
जब तक थी साँस लड़े वो
फिर अपनी लाश बिछा दी
संगीन पे धर कर माथा
सो गये अमर बलिदानी
जो शहीद...
जब देश में थी दीवाली
वो खेल रहे थे होली
जब हम बैठे थे घरों में
वो झेल रहे थे गोली
थे धन्य जवान वो आपने
थी धन्य वो उनकी जवानी
जो शहीद...
कोई सिख कोई जाट मराठा
कोई गुरखा कोई मदरासी
सरहद पर मरनेवाला
हर वीर था भारतवासी
जो खून गिरा पर्वअत पर
वो खून था हिंदुस्तानी
जो शहीद...
थी खून से लथ-पथ काया
फिर भी बन्दूक उठाके
दस-दस को एक ने मारा
फिर गिर गये होश गँवा के
जब अन्त-समय आया तो
कह गये के अब मरते हैं
खुश रहना देश के प्यारों
अब हम तो सफ़र करते हैं
क्या लोग थे वो दीवाने
क्या लोग थे वो अभिमानी
जो शहीद...
तुम भूल न जाओ उनको
इस लिये कही ये कहानी
जो शहीद...
जय हिन्द... जय हिन्द की सेना -२
जय हिन्द, जय हिन्द, जय हिन्द
ऐ मेरे प्यारे वतन
ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन
तुझ पे दिल क़ुरबान
तू ही मेरी आरज़ू, तू ही मेरी आबरू
तू ही मेरी जान
(तेरे दामन से जो आए उन हवाओं को सलाम
चूम लूँ मैं उस ज़ुबाँ को जिसपे आए तेरा नाम ) - २
सबसे प्यारी सुबह तेरी
सबसे रंगीं तेरी शाम
तुझ पे दिल क़ुरबान ...
(माँ का दिल बनके कभी सीने से लग जाता है तू
और कभी नन्हीं सी बेटी बन के याद आता है तू ) - २
जितना याद आता है मुझको
उतना तड़पाता है तू
तुझ पे दिल क़ुरबान ...
(छोड़ कर तेरी ज़मीं को दूर आ पहुंचे हैं हम
फिर भी है ये ही तमन्ना तेरे ज़र्रों की क़सम ) - २
हम जहाँ पैदा हुए
उस जगह पे ही निकले दम
तुझ पे दिल क़ुरबान ...
तुझ पे दिल क़ुरबान
तू ही मेरी आरज़ू, तू ही मेरी आबरू
तू ही मेरी जान
(तेरे दामन से जो आए उन हवाओं को सलाम
चूम लूँ मैं उस ज़ुबाँ को जिसपे आए तेरा नाम ) - २
सबसे प्यारी सुबह तेरी
सबसे रंगीं तेरी शाम
तुझ पे दिल क़ुरबान ...
(माँ का दिल बनके कभी सीने से लग जाता है तू
और कभी नन्हीं सी बेटी बन के याद आता है तू ) - २
जितना याद आता है मुझको
उतना तड़पाता है तू
तुझ पे दिल क़ुरबान ...
(छोड़ कर तेरी ज़मीं को दूर आ पहुंचे हैं हम
फिर भी है ये ही तमन्ना तेरे ज़र्रों की क़सम ) - २
हम जहाँ पैदा हुए
उस जगह पे ही निकले दम
तुझ पे दिल क़ुरबान ...
इन्साफ़ की डगर पे
इन्साफ़ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के
ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के
दुनिया के रंज सहना और कुछ न मुँह से कहना
सच्चाइयों के बल पे आगे को बढ़ते रहना
रख दोगे एक दिन तुम संसार को बदल के
इन्साफ़ की ...
अपने हों या पराए सबके लिये हो न्याय
देखो कदम तुम्हारा हरगिज़ न डगमगाए
रस्ते बड़े कठिन हैं चलना सम्भल-सम्भल के
इन्साफ़ की ...
इन्सानियत के सर पर इज़्ज़त का ताज रखना
तन मन भी भेंट देकर भारत की लाज रखना
जीवन नया मिलेगा अंतिम चिता में जल के,
इन्साफ़ की ...
सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा
सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा
हम बुलबुले हैं इसकी, वो गुलसितां हमारा
पर्वत वो सबसे ऊँचा, हमसाया आसमाँ का
वो संतरी हमारा, वो पासवां हमारा, सारे...
गोदी में खेलती हैं, जिसकी हज़ारों नदियां
गुलशन है जिसके दम से, रश्क-ए-जिनां हमारा
सारे....
मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम वतन हैं, हिन्दोस्तां हमारा, सारे...
हम बुलबुले हैं इसकी, वो गुलसितां हमारा
पर्वत वो सबसे ऊँचा, हमसाया आसमाँ का
वो संतरी हमारा, वो पासवां हमारा, सारे...
गोदी में खेलती हैं, जिसकी हज़ारों नदियां
गुलशन है जिसके दम से, रश्क-ए-जिनां हमारा
सारे....
मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम वतन हैं, हिन्दोस्तां हमारा, सारे...
saare jahaan se achcha hindostaan hamaraa
hum bul bulain hai is kee, ye gulsitan hamaraa
hum bul bulain hai is kee, ye gulsitan hamaraa
parbat vo sabse unchaa hum saaya aasma kaa
vo santaree hamaraa, vo paasbaan hamaraa
godee mein khel tee hain is kee hazaaron nadiya
gulshan hai jinke dum se, rashke janna hamaraa
gulshan hai jinke dum se, rashke janna hamaraa
mazhab nahee sikhataa apas mein bayr rakhnaa
hindee hai hum, vatan hai hindostaan hamaraa
hindee hai hum, vatan hai hindostaan hamaraa
बुधवार, 14 अप्रैल 2010
भारत का राष्ट्रीय गान
"भारतीय राष्ट्रीय गान, रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा बंगाली में बना था , इसके हिन्दी संस्करण में संविधान सभा द्वारा 24 जनवरी 1950 को भारत के राष्ट्रीय गान के रूप में अपनाया गया था. यह पहली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता सत्र में 27 दिसम्बर 1911 को गाया गया . पूरा गाने में पांच पद शामिल हैं. राष्ट्रीय गान के पूर्ण संस्करण को गाने में लगभग 52 सेकंड का समय लगता है. राष्ट्रीय गीत अंग्रेजी में स्वयं रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा प्रदान किया गया "
जन गण मन अधिनायक जय हे
भारत भाग्यविधाता
पंजाब सिन्धु गुजरात मराठा
द्राविड़ उत्कल बंगा
विन्ध्य हिमाचल यमुना गंगा
उच्छल जलधि तरंगा
तव शुभ नामे जागे
तव शुभ आशीष मांगे
गाहे तव जयगाथा
जन गण मंगलदायक जय हे
भारत भाग्यविधाता
जय हे, जय हे, जय हे
जय जय जय जय हे!
भारत भाग्यविधाता
पंजाब सिन्धु गुजरात मराठा
द्राविड़ उत्कल बंगा
विन्ध्य हिमाचल यमुना गंगा
उच्छल जलधि तरंगा
तव शुभ नामे जागे
तव शुभ आशीष मांगे
गाहे तव जयगाथा
जन गण मंगलदायक जय हे
भारत भाग्यविधाता
जय हे, जय हे, जय हे
जय जय जय जय हे!
मंगलवार, 13 अप्रैल 2010
नही ... नही.... नही
एक बार एक राजा शिकार के लिए जंगल में गया. उसने जंगल में अपने धनुष् से एक शेर का शिकार किया . लेकिन तीर लगने के बाद मरने के पहले उस शेर ने दर्द की वजह से तडप तडपकर बहुत दहाडे मारी. लेकिन उसकी वजह से वहां ध्यानस्थ बैठे एक ऋषी की तपस्या भंग हुई और उसने गुस्से के मारे राजा को शाप दिया की तुम्हारी उंचाई 25 फिट हो ताकी किसी भी जानवर का शिकार करने से पहले उसे तुम्हारी आहट हो. गुस्से के मारे ऋषी ने शाप तो दिया लेकिन उसकी वजह से राजा की उंचाई इतनी बढ गई कि उसे कही भी जाना एकदम दुश्वार हो गया. इसलिए राजा ने ऋषी से माफी मांगकर क्षमा याचना की और उसकी उंचाई पहले जैसी करनेके लिए विनती की. राजा के बहुत मनाने के बाद ऋषी का गुस्सा कम होकर राजा को उसने उसकी उंचाई पहले जैसी करने की एक तरकीब बताई. -
'' यहां से आगे 15 किमी जंगल के अंदर एक पागल औरत रहती है ... तूम उसे ढूंढो और उसे ऐसा सवाल पुछो की जिसका जवाब उसने 'नही' ऐसा देना चाहिए...तूम उसे कितने भी सवाल पुछो... उस औरत ने जितनी बार 'नही' कहा उतनी बार तुम्हारी उंचाई 5 फिटसे कम होगी. ''
राजा ने वहांसे आगे 15 किमी जंगल पछाडकर उस पागल औरत को ढूंढा और उस ऋषी के कहे अनुसार उस औरत को अलग अलग सवाल पुछे.
'' तुझे फांसी लगाऊं ?''
'' हां ''
'' तुझे जंगलसे बाहर निकाल दूं ?''
'' हां''
राजा ने उसे न जाने कितने सवाल पुछे लेकिन उसका जवाब 'हां' ही था.
आखिर राजा ने चिढकर उसे सवाल पुछा - '' तूम पागल हो क्या ?''
उसने झटसे जवाब दिया - '' नही''
और क्या आश्चर्य राजाकी उंचाई तुरंत पांच फिटसे घट गई.
राजा की ऊंचाई अब 20 फिट हो गई. 20 फिट उंचाई भी बहुत जादा थी इसलिए राजा ने उसे फिरसे वही सवाल पुछा -
'' तूम पागल हो क्या ?''
उसने फिरसे जवाब दिया '' नही''
राजा की उंचाई फिरसे 5 फिट घट गई और अब राजा 15 फिटका हो गया था. 15 फिट भी अधिक थे इसलिए राजा ने फिर से उस पागल औरत से पुछा - '' तूम पागल हो क्या?''
वह पागल औरत चिढकर बोली, '' तुम्हे कितनी बार बताना पडेगा, नही, नही, नही''
'' यहां से आगे 15 किमी जंगल के अंदर एक पागल औरत रहती है ... तूम उसे ढूंढो और उसे ऐसा सवाल पुछो की जिसका जवाब उसने 'नही' ऐसा देना चाहिए...तूम उसे कितने भी सवाल पुछो... उस औरत ने जितनी बार 'नही' कहा उतनी बार तुम्हारी उंचाई 5 फिटसे कम होगी. ''
राजा ने वहांसे आगे 15 किमी जंगल पछाडकर उस पागल औरत को ढूंढा और उस ऋषी के कहे अनुसार उस औरत को अलग अलग सवाल पुछे.
'' तुझे फांसी लगाऊं ?''
'' हां ''
'' तुझे जंगलसे बाहर निकाल दूं ?''
'' हां''
राजा ने उसे न जाने कितने सवाल पुछे लेकिन उसका जवाब 'हां' ही था.
आखिर राजा ने चिढकर उसे सवाल पुछा - '' तूम पागल हो क्या ?''
उसने झटसे जवाब दिया - '' नही''
और क्या आश्चर्य राजाकी उंचाई तुरंत पांच फिटसे घट गई.
राजा की ऊंचाई अब 20 फिट हो गई. 20 फिट उंचाई भी बहुत जादा थी इसलिए राजा ने उसे फिरसे वही सवाल पुछा -
'' तूम पागल हो क्या ?''
उसने फिरसे जवाब दिया '' नही''
राजा की उंचाई फिरसे 5 फिट घट गई और अब राजा 15 फिटका हो गया था. 15 फिट भी अधिक थे इसलिए राजा ने फिर से उस पागल औरत से पुछा - '' तूम पागल हो क्या?''
वह पागल औरत चिढकर बोली, '' तुम्हे कितनी बार बताना पडेगा, नही, नही, नही''
"हिन्दी" शब्द की व्युत्पत्ति
हिन्दी शब्द का सम्बंध संस्कृत शब्द सिन्धु से माना जाता है। 'सिन्धु' सिन्ध नदी को कहते थे ओर उसी आधार पर उसके आसपास की भूमि को सिन्धु कहने लगे। यह सिन्धु शब्द ईरानी में जाकर ‘हिन्दु’, हिन्दी और फिर ‘हिन्द’ हो गया। बाद में ईरानी धीरे-धीरे भारत के अधिक भागों से परिचित होते गए और इस शब्द के अर्थ में विस्तार होता गया तथा हिन्द शब्द पूरे भारत का वाचक हो गया। इसी में ईरानी का ईक प्रत्यय लगने से (हिन्द ईक) ‘हिन्दीक’ बना जिसका अर्थ है ‘हिन्द का’। यूनानी शब्द ‘इन्दिका’ या अंग्रेजी शब्द ‘इण्डिया’ आदि इस ‘हिन्दीक’ के ही विकसित रूप हैं। हिन्दी भाषा के लिए इस शब्द का प्राचीनतम प्रयोग शरफुद्दीन यज्+दी’ के ‘जफरनामा’(१४२४) में मिलता है। प्रोफ़ेसर महावीर सरन जैन ने अपने " हिन्दी एवं उर्दू का अद्वैत " शीर्षक आलेख में हिन्दी की व्युत्पत्ति पर विचार करते हुए कहा है कि ईरान की प्राचीन भाषा अवेस्ता में 'स्' ध्वनि नहीं बोली जाती थी। 'स्' को 'ह्' रूप में बोला जाता था। जैसे संस्कृत के 'असुर' शब्द को वहाँ 'अहुर' कहा जाता था। अफ़ग़ानिस्तान के बाद सिन्धु नदी के इस पार हिन्दुस्तान के पूरे इलाके को प्राचीन फ़ारसी साहित्य में भी 'हिन्द', 'हिन्दुश' के नामों से पुकारा गया है तथा यहाँ की किसी भी वस्तु, भाषा, विचार को 'एडजेक्टिव' के रूप में 'हिन्दीक' कहा गया है जिसका मतलब है 'हिन्द का'। यही 'हिन्दीक' शब्द अरबी से होता हुआ ग्रीक में 'इंदिके', 'इंदिका', लैटिन में 'इंदिया' तथा अँगरेज़ी में 'इंडिया' बन गया। अरबी एवं फ़ारसी साहित्य में हिन्दी में बोली जाने वाली ज़बानों के लिए 'ज़बान-ए-हिन्दी', लफ़्ज का प्रयोग हुआ है। भारत आने के बाद मुसलमानों ने 'ज़बान-ए-हिन्दी', 'हिन्दी जुबान' अथवा 'हिन्दी' का प्रयोग दिल्ली-आगरा के चारों ओर बोली जाने वाली भाषा के अर्थ में किया। भारत के गैर-मुस्लिम लोग तो इस क्षेत्र में बोले जाने वाले भाषा-रूप को 'भाखा' नाम से पुकराते थे, 'हिन्दी' नाम से नहीं।
हिन्दी
हिन्दी संवैधानिक रूप से भारत की प्रथम राजभाषा है और भारत की सबसे अधिक बोली और समझी जानेवाली भाषा है। चीनी के बाद यह विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा भी है।
हिन्दी और इसकी बोलियाँ उत्तर एवं मध्य भारत के विविध प्रांतों में बोली जाती हैं । भारत और विदेश में ६० करोड़ से अधिक लोग हिन्दी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। फ़िजी,मॉरिशस, गयाना, सूरीनाम की अधिकतर और नेपाल की कुछ जनता हिन्दी बोलती है।
हिन्दी राष्ट्रभाषा, राजभाषा, सम्पर्क भाषा, जनभाषा के सोपानों को पार कर विश्वभाषा बनने की ओर अग्रसर है। भाषा विकास क्षेत्र से जुड़े वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी हिन्दी प्रेमियों के लिए बड़ी सन्तोषजनक है कि आने वाले समय में विश्वस्तर पर अन्तरराष्ट्रीय महत्त्व की जो चन्द भाषाएँ होंगी उनमें हिन्दी भी प्रमुख होगी।
सोमवार, 12 अप्रैल 2010
KYA LIKHU
दोस्तों आज इस ब्लागस्पाट के मंच से मै "गौरव त्रिपाठी" आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ मित्रो मै यहाँ इस मंच पर अपने विचारो को व्यक्त करने आया हूँ आप लोगो का सहयोग अपेक्षित है
धन्यवाद
प्रिय मित्रो,
आपके मनोरंजन हेतु आपका यह मित्र नए नए व्यंग्य, कहानियां, चुटकुले, एवं ज्ञान से परिपूर्ण रोचक तथ्यों आदि को आप तक पहुचाने को वचनबद्ध है
धन्यवाद
प्रिय मित्रो,
आपके मनोरंजन हेतु आपका यह मित्र नए नए व्यंग्य, कहानियां, चुटकुले, एवं ज्ञान से परिपूर्ण रोचक तथ्यों आदि को आप तक पहुचाने को वचनबद्ध है
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